चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

अपने ब्लॉग में मोदी लिखते हैं, "बापू ने त्याग की भावना पर बल देते हुए यह सीख दी कि आवश्यकता से अधिक संपत्ति के पीछे भागना ठीक नहीं है जबकि कांग्रेस ने बापू की इस शिक्षा के विपरीत अपने बैंक खातों को भरने और सुख-सुविधाओं वाली जीवन शैली को अपनाने का ही काम किया".
दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के सबसे बड़े नेता बड़े अरबपतियों के साथ सबसे ज़्यादा ख़ुश नज़र आते हैं, मानो इन उद्योगपतियों ने देश के निर्धन जन की सेवा करके अरबों कमाए हैं. कॉर्पोरेट दुनिया से मौजूदा सत्ता के रिश्ते वैसे ही हैं, जैसे कांग्रेस के थे. कुछ लोग तो वो तस्वीर भी पेश कर देते हैं जिसमें अरबपति मुकेश अंबानी पीएम मोदी की पीठ पर हाथ रखकर खड़े हैं.
इसके बाद मोदी जी ने कांग्रेस के वंशवाद पर करारी चोट की है, यह कांग्रेस की ऐसी कमज़ोरी है जिसका भरपूर फ़ायदा उठाया जा सकता है. यह बात वह अच्छी तरह जानते हैं.
मोदी ने अपने ब्लॉग में लिखा- "बापू वंशवादी राजनीति की निंदा करते थे, लेकिन ख़ानदान सबसे ऊपर, यह आज कांग्रेस का मूलमंत्र बन चुका है".
वंशवाद कांग्रेस की पहचान रही है, इसमें कोई शक नहीं है, जब एक गांधी से काम नहीं चला तो प्रियंका को भी बुलाया गया है. कांग्रेस में शायद ही कभी परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति नेतृत्व की भूमिका में आया. नरसिंह राव और सीताराम केसरी जैसे परिवार से बाहर के लोगों का पार्टी के भीतर कोई नामलेवा भी नहीं है.
यह बात सही है कि बीजेपी के दो शीर्ष नेताओं के परिवार के लोग इस समय राजनीति में नहीं हैं लेकिन राजनाथ सिंह, वसुंधरा राजे, येदियुरप्पा और लालजी टंडन जैसे पार्टी के बीसियों नेता ऐसे हैं जिनके बच्चे राजनीति में सेट कर दिए गए हैं. यानी बीजेपी यह नहीं कह सकती वह सैद्धांतिक तौर पर वंशवाद के ख़िलाफ़ है.
इमरजेंसी कांग्रेस के इतिहास का एक ऐसा कलंक है जिसे धो पाना उसके लिए बहुत मुश्किल है. इमरजेंसी पर होने वाली खिंचाई का कांग्रेस के पास कोई जवाब हो भी नहीं सकता.
मोदी ने अपने ब्लॉग में लिखा है, "कांग्रेस ने देश को आपातकाल दिया, यह वह वक्त था, जब हमारी लोकतांत्रिक भावनाओं को रौंद डाला गया था. यही नहीं, कांग्रेस ने धारा 356 का कई बार दुरुपयोग किया. अगर कोई नेता उन्हें पसंद नहीं आता था तो वे उसकी सरकार को ही बर्खास्त कर देते थे".
पीएम मोदी ने जो कुछ लिखा है, उसका एक-एक शब्द सही है. अब अगर इन्हीं पैमानों पर बीजेपी को परखें तो कुछ मिसालें अपने-आप याद आती हैं. अरूणाचल प्रदेश में सरकार को गिराकर राष्ट्रपति शासन लगाने वाली बीजेपी के फ़ैसले को 13 जुलाई 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने पलटा और उसने नबाम टुकी को दोबारा मुख्यमंत्री बनाया. इसी तरह उत्तराखंड में कांग्रेस की हरीश रावत सरकार को भी गिरा दिया गया था, बीजेपी के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट ने 12 मई 2016 को ग़लत ठहराया और हरीश रावत को दोबारा मुख्यमंत्री घोषित किया.
यह तो बात हुई 356 के दुरुपयोग की, अब लोकतांत्रिक भावनाओं की भी चर्चा कर लें. अगर कोई बीजेपी विरोधी व्यक्ति यह बात कहे तो आप उसे खारिज कर सकते हैं, अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में वरिष्ठ मंत्री रहे यशवंत सिन्हा की राय कुछ ऐसी है, "इंदिरा गांधी ने संविधान को संवैधानिक तरीके से नष्ट किया. उन्होंने दिखाया कि इमरजेंसी कैसे लगाई जा सकती है. मौजूदा प्रधानमंत्री ने संविधान को नष्ट नहीं किया है, उन्होंने संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थानों को नष्ट कर दिया है और इस तरह इमरजेंसी जैसे ही हालत बना दिए हैं."
बहरहाल, मोदी ऐसा माहौल बनाने में कामयाब होते दिखते हैं कि कांग्रेस वंशवादी राजनीति कर रही है, और वे निस्वार्थ राष्ट्रसेवा कर रहे हैं जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है. लेकिन, यह राजनीति ही है और वह भी चुनावी राजनीति, अभी बहुत कुछ लिखा और बोला जाएगा. सच तो ये है कि मोदी दूसरों को आईना तो दिखाते हैं पर ख़ुद नहीं देखते.

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