'मैंने एक राक्षस को मारा'

पुलिस ने मुझे उस घटना को लेकर पेरिस के बयान की रिकॉर्डिंग दी. पेरिस ने कहा था- हम दोनो (पेरिस-एली) एक ही बिस्तर पर सो रहे थे. जब मैं सो कर उठा तो मैंने देखा कि वह एक राक्षस में तब्दील हो गई है. तो मैंने उस राक्षस को मार दिया."
"लगभग तीन महीने के लिए मैंने इस पर यकीं करना चाहा कि मेरा बेटा बीमार है. जब पेरिस को गिरफ़्तार किया गया तो उसका बेहद हिंसक रूप सामने आया."
जांच में यह पता चला कि पेरिस ने बेहद चौंकाने वाली चीजें इंटरनेट पर सर्च कीं. इसके साथ ही बेहद भयानक चीजें उनसे अपनी बहन की हत्या के दौरान कीं.
आखिरकार पेरिस ने माना कि ये कोई दुर्घटना नहीं थी. वह अपनी बहन की हत्या करना चाहता था. साल 2007 में पेरिस को 70 साल की सज़ा दी गई.
ख़ुद को दोषी मानने के सवाल पर चैरिटी ने कहा, "हां और नहीं भी, मैंने हमेशा इस बात की ज़िम्मेदारी ली है कि मेरे नशे में दोबारा जाने का असर पेरिस पर पड़ा. मुझे लगता है कि इसका बड़ा कारण आनुवांशिक हैं."
''मुझे लगता है कि वह दूसरे फ़ैसले ले सकता था. हम सब में ये क़ाबिलियत होती है. ये अलग बात होती कि उसे कोई डिसऑर्डर होता और वह सही-ग़लत में भेद नहीं कर पाता लेकिन ऐसा नहीं था. उसने मुझे बताया था कि उसने एला को इसलिए मारा क्योंकि ये मेरे लिए गहरी चोट होती.''
''बिना किसी संदेह, वो मानसिक तौर पर बीमार था.''ल 2013 में , लगभग छह साल बाद चैरिटी फिर गर्भवती हुईं. उन्होंने बच्चे का नाम फ़ोनिक्स रखा. चैरिटी कहती हैं, ''पेरिस और एला के साथ जो हुआ वो मेरी ज़िंदगी का अंत नहीं है. ज़िंदगी आगे भी है."
पेरिस टेक्सास की एक जेल में बंद हैं. वह अब लगभग  साल का हो चुका है. चैरिटी उससे मिलने अब भी जाती हैं और फ़ोन पर भी बात करती हैं. संभव है कि वह 2047 में जेल से बाहर आए.
वीडियोकॉन समूह को लोन दिए जाने के मामले में आरोपों का सामना कर रही चंदा कोचर ने गुरुवार को आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ, प्रबंध निदेशक और बैंक के सब्सिडिअरी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर के पद को छोड़ दिया.
भले ही आज उनका नाम ग़लत कारणों से चर्चा में है और जिसकी वजह से उन्हें रिटायरमेंट से पहले अपना पद तक गंवाना पड़ा है, लेकिन आईसीआईसीआई बैंक के सीईओ पद तक का सफ़र तय करने में चंदा कोचर की मेहनत और लगन एक मिसाल के तौर पर दी जाती रही है.
चंदा कोचर वो नाम है जिन्होंने न केवल भारतीय बैंकिंग सेक्टर में पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ा बल्कि पूरी दुनिया में बैंकिंग के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई.
एक मैनेजमेंट ट्रेनी के पद से अपने करियर की शुरुआत कर आईसीआईसीआई बैंक का सीईओ बनने और फोर्ब्स पत्रिका में 'दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिलाओं' की सूची में शुमार होने वाली चंदा कोचर का जीवन एक महिला की सफलता की दमदार कहानी है.
चंदा कोचर सफलता के इस मुकाम तक कैसे पहुंचीं और आख़िर वो क्या कारण थे जिसकी वजह से उन्हें समय से पहले अपना पद छोड़ना पड़ा?
राजस्थान के जोधपुर में जन्मीं चंदा कोचर की स्कूली पढ़ाई जयपुर से हुई. इसके बाद मुंबई के जय हिंद कॉलेज से उन्होंने मानविकी में ग्रैजुएशन किया.
1982 में ग्रैजुएशन के बाद जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट स्टडीज़ से मास्टर्स की पढ़ाई की.
मैनेजमेंट स्टडीज़ में बेहतरीन परफॉर्मेंस के लिए चंदा कोचर को वोकहार्ड्ट गोल्ड मेडल और एकाउंटेंसी में जेएन बोस गोल्ड मेडल मिल चुका है.
1984 में बतौर मैनेजमेंट ट्रेनी चंदा कोचर ने आईसीआईसीआई जॉइन किया.
1955 में आईसीआईसीआई (इंडस्ट्रियल क्रेडिट ऐंड इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया) का गठन भारतीय उद्योगों को प्रोजेक्ट आधारित वित्तपोषण के लिए एक संयुक्त उपक्रम वित्तीय संस्थान के रूप में किया गया था.
जब 1994 में आईसीआईसीआई संपूर्ण स्वामित्व वाली बैंकिंग कंपनी बन गई तो चंदा कोचर को असिस्टेंट जनरल मैनेजर बनाया गया.
चंदा कोचर लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ती गईं. डिप्टी जनरल मैनेजर, जनरल मैनेजर के पदों से होती हुई 2001 में बैंक ने उन्हें एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बना दिया. इसके बाद उन्हें कॉरपोरेट बिज़नेस देखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. फिर वो चीफ़ फ़ाइनेंशियल ऑफ़िसर बनाई गईं.
2009 में चंदा कोचर को सीईओ और एमडी बनाया गया. चंदा कोचर के ही नेतृत्व में आईसीआईसीआई बैंक ने रिटेल बिज़नेस में क़दम रखा जिसमें उसे अपार सफलता मिली.
यह उनकी योग्यता और बैंकिंग सेक्टर में उनके योगदान का ही प्रमाण है कि भारत सरकार ने चंदा कोचर को अपने तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से (2011 में) नवाजा.
आईसीआईसीआई के कार्यकाल के दौरान चंदा कोचर को भारत और विदेशों में बैंक के कई तरह के संचालनों की ज़िम्मेदारी दी गई थी. लगातार नौ सालों तक सीईओ रहीं चंदा कोचर पर फिर 2018 की शुरुआत में वीडियोकॉन ग्रुप को लोन देने और फिर अनुचित तरीके से निजी लाभ लेने का आरोप लगा और मामला इतना बढ़ गया कि मार्च 2019 में होने वाले कार्यकाल की समाप्ति से कुछ ही महीने पहले 4 अक्टूबर 2018 को उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा.

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